छत्तीसगढ़ में पानी-सौर ऊर्जा से हाइड्रोजन बनेगी ऑन स्पॉट, ईंधन के लिए गेमचेंजर | Hydrogen will be made on spot from water-solar energy in Chhattisgarh, game changer for fuel

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भिलाई20 घंटे पहले

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प्रतीकात्मक तस्वीर - Dainik Bhaskar

प्रतीकात्मक तस्वीर

देशभर में ग्रीन ईंधन के बड़े विकल्प के तौर पर ग्रीन हाइड्रोजन की बात चल रही है, लेकिन छत्तीसगढ़ में आईआईटी भिलाई ने ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। आईआईटी के विशेषज्ञों की टीम ने जो प्लान तैयार किया है, उसकी खासियत ये है कि हाईड्रोजन के लिए बड़े प्लांट के बजाय छोटे-छोटे यूनिट तैयार होने हैं, जो जरूरत पर मौके पर (ऑन स्पॉट) ही सोलर एनर्जी से पानी का विघटन कर हाइड्रोजन और

ऑक्सीजन अलग-अलग निकालने लगेंगे। पानी के विघटन के लिए एनर्जी चाहिए और यह एनर्जी भी पेट्रोलियम या ऐसे किसी पदार्थ से नहीं बनाई जाएगी, जिससे पर्यावरण को नुकसान हो। आईआईटी के मिशन हाइड्रोजन में एक-दो रुकावटें ही बची हैं, लेकिन विशेषज्ञों का दावा है कि इसका तोड़ भी निकाल लिया गया है। जल्दी ही पानी और सोलर एनर्जी के उपयोग से छोटी यूनिट में हाइड्रोजन बनाने का प्रोटोटाइप तैयार हो जाएगा। शेष|पेज 10

यह इस तरह रहेगा कि फ्यूल सेल के रूप में कार में ही हाईड्रोजन पैदा कर सकेगा। वहीं, जरूरत के हिसाब से कारखानों में भी बड़ी-छोटी यूनिट बनाकर लगाई जा सकेंगी। हाईड्रोजन अभी 300 रुपए किलो यानी पेट्रोल से महंगी है। आईआईटी की टीम अपने फार्मूले से बनने वाली ग्रीन हाइड्रोजन का रेट 100-150 रुपए किलो तक पहुंचाने वाली है।

पानी को तोड़ना आसानी नहीं, ये समस्याएं
1. पानी का विघटन यानी तोड़ना

पानी को हाईड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ना आसान लगता है, पर है नहीं। दो समस्याएं हैं, पहली यह कि हाईड्रोजन और ऑक्सीजन अलग-अलग निकलें और इसे तोड़ने में कम से कम इलेक्ट्रिक एनर्जी खर्च हो। इसके बाद दोनों गैसें मिक्स होने के बजाय अलग-अलग बाहर अाएं। इसके लिए मेंब्रेन टेक्नालाॅजी है, जो हमें चाहिए।
2. पानी तोड़ने को एनर्जी चाहिए
पानी के माइक्यूल को तोड़ने के लिए एनर्जी चाहिए। लोग इसके लिए पेट्रोलियम, कोक उपयोग कर रहे, लेकिन हम सोलर एनर्जी यूज करेंगे। इसे जनरेट करने के लिए बैटरी यूज करेंगे तो यह अलग खर्चा है। इसलिए हम छोटे हाइड्रोजन इलेक्ट्रोलाइजर बनाएंगे, जो सोलर ऊर्जा को लेकर पानी के माॅलिक्यूल से ग्रीन हाइड्रोजन बनाएंगे।

ग्रीन हाइड्रोजन महंगा, रेट घटाने में जुटे विशेषज्ञ | मोदी सरकार के राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य 2030 तक 5 मिलियन टन का उत्पादन करना है। अभी हाइड्रोजन पेट्रोल-डीजल से महंगा (300 रुपए किलो) है। इस्तेमाल बढ़ाने के लिए विशेषज्ञ टीम रेट 150 रु. किलो तक लाने में जुटी है। एक लीटर पेट्रोल से जितनी गाड़ी चलती है, उससे कई किलोमीटर ज्यादा आधा लीटर हाइड्रोजन से चल जाएगी।

फ्यूल सेल से कार में ही बनेगी
कार में सीएनजी, एलपीजी का सिलेंडर लगाना पड़ता है। जबकि हाइड्रोजन के लिए इसकी जरूरत नहीं होगी। कार में हम एक फ्लूस सेल लगाकर हाइड्रोजन बना सकते हैं। जापान इसमें सबसे आगे है। हालांकि फ्यूल सेल अभी महंगा है, लेकिन भविष्य में इस पर खर्च कम आएगा। कोशिश है हाइड्रोजन मिशन जल्द पूरा होगा। सरकार ने इसके लिए कई बैरियर्स हटा दिए गए है।

ग्रीन हाइड्रोजन बनाने का फार्मूला
फ्यूल का उपयोग नहीं करेंगे। प्रोडक्ट ग्रीन तरीके से बनाएं। तो ग्रीन तरीका है वाटर। पानी का सूत्र एच 2 ओ है। एच 2 ओ को तोड़े तो 2 एच और 1 ओ मिलेगा। दो वाटर के मालिक्यूल ले तो इसे तोड़ेने से 4 एच और 2 ओ मिलेगा। 4 एच का मतलब दो मालिक्यूल हाइड्रोजन और एक मालिक्यूल ऑक्सीजन। हाईड्रोजन एनर्जी के लिए लेंगे और अाॅक्सीजन अस्पतालों में भेज देंगे।

ऑन स्पॉट बनाने से ट्रांसपोर्टिंग का खतरा भी नहीं | ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए प्रदेश में एक-दो बड़ी यूनिट लगाने के बजाए छोटे यूनिट तैयार करेंगे और जहां जरूरत होगी, वहां लगा देंगे ताकि वहीं उत्पादन और उपयोग होता रहे। सप्लाई में खतरा इसलिए है क्योंकि हाइड्रोजन बेहद ज्वलनशील होती है।

प्रो. राजीव प्रकाश डायरेक्टर-आईआईटी ने लिखा भास्कर के लिए

आईआईटी भिलाई की टीम ग्रीन हाइड्रोजन के प्रोडक्शन तथा इसे सस्ता बनाने की दिशा में काम कर रही है। टीम में आईआईटी भिलाई के 4 एक्सपर्ट प्रोफेसर, कुछ स्टूडेंट्स को रखा है जो स्टार्टअप भी करेंगे। टीम को केटीएच स्वीडन और कैम्ब्रिज लंदन में एनर्जी पर काम कर चुके भारतीय मूल के दो वैज्ञानिक मदद कर रहे हैं। आईआईटी भिलाई के कैंपस में ग्रीन हाइड्रोजन के लिए टेस्ट बैड और ओपन लेबोरेटरी बना रहे हैं, जहां कोई इंडस्ट्री, स्टार्टअप कंपनी, स्टूडेंट्स या प्रोफेसर अपने आइडिए पर मुफ्त रिसर्च कर सकेंगे। इस प्रयोगशाला में इलेक्ट्रोलाइजर और इकोनोमिक इलेक्ट्रोड्स पर भी काम होगा।

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