कलेक्टर और निगम आयुक्त का तबादला, मनोज राजपूत पर हाथ डालना पड़ गया भारी

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दुर्ग। शासन स्तर पर की गई बड़ी प्रशासनिक सर्जरी में दुर्ग के दो बड़े अधिकारी प्रभावित हुए हैं। इनमें कलेक्टर डॉ. सर्वेश्वर दयाल भुरे और नगर निगम के आयुक्त (संयुक्त कलेक्टर) हरेश मंडावी शामिल हैं। शासन द्वारा दो बड़े अधिकारियों के तबादले को पिछले दिनों अतिक्रमण के नाम पर हुई कार्रवाई के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस नेता व भू-व्यवसायी मनोज राजपूत के यहां की गई तोडफ़ोड़ की वजह से ही इन दोनों अधिकारियों का तबादला हुआ है।

उल्लेखनीय है कि कुछ दिनों पूर्व धमधा नाका बाइपास स्थित एमआर (मनोज राजपूत) ले आउट एवं डेवलपर्स के प्रवेश द्वार समेत चारों ओर बनाई गई बाउंड्रीवाल को तोड़ दिया गया था। यह कार्रवाई नगर निगम दुर्ग, राजस्व व ग्राम एवं निवेश विभाग ने संयुक्त रूप से की थी। कार्रवाई के दौरान मौजूद अफसरों ने कार्रवाई को जायज ठहराते हुए अवैध प्लाटिंग को हटाने की बात कही थी। इस दौरान प्रवेश द्वार के साथ ही कच्ची सड़क व अस्थाई मकानों को भी जेसीबी के जरिए धराशायी किया गया था। मनोज राजपूत ने जमीन का व्यवसाय करते-करते बिल्डर तक का सफर तय किया। उन्हें भिलाई के युवा विधायक का करीबी माना जाता है। मनोज राजपूत के यहां तोडफ़ोड़ की खबरों के बाद हालांकि राजनीतिक तौर पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी, किन्तु ऐसा माना जा रहा था कि इस कार्रवाई के पीछे जिन अफसरों की भूमिका है, देर-सबेर वे निशाने पर जरूर आएंगे।

आयोजन की पूरा खर्च चाहते थे…

बताया जाता है कि दुर्ग के गंजमंडी में कांग्रेस पार्टी का एक बड़ा आयोजन हुआ था। इस आयोजन में लाखों रूपए खर्च हुए। कार्यक्रम के आयोजक इन लाखों रूपयों का व्यय मनोज राजपूत के जरिए करवाना चाहते थे। बताते हैं कि मनोज राजपूत आयोजन के लिए अपना अंशदान देने को राजी थे, किन्तु आयोजक उनसे पूरा खर्च चाहते थे। पूरा खर्च देने में असमर्थ रहने की ही वजह से उनके खिलाफ नगर निगम और प्रशासनिक मशीनरी के जरिए बड़ी कार्रवाई करवाई गई। जबकि विगत करीब १० वर्षों से मनोज के खिलाफ कार्रवाई लंबित थी। बताया जाता है कि तोडफ़ोड़ की उक्त कार्रवाई को ऊपर से आए आदेश के बाद करने की बात कही गई थी, किन्तु बाद में पता चला कि ऊपर से कोई आदेश नहीं आया था, बल्कि स्थानीय नेताओं ने ही दबाव बनाकर कार्रवाई को अंजाम दिया था।

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स्थानीय नेताओं को नहीं मिल रही थी तवज्जो

बताया जाता है कि मनोज राजपूत व उनके साथी सीधे भिलाई विधायक के जरिए मुख्यमंत्री से जुड़े हुए थे। यही वजह है कि उनकी कार्यप्रणाली दुर्ग के कई स्थानीय नेताओं को रास नहीं आ रही थी। सूत्रों के मुताबिक, मनोज राजपूत ने कभी भी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं नहीं दिखाई। वे लम्बे समय से अपने व्यवसायिक पक्ष को मजबूत करने में लगे थे। अलबत्ता, उनके संबंध जरूर कई बड़े नेताओं से हैं। यही वजह है कि दुर्ग के कांग्रेसियों की आंखों में वे किरकिरी की तरह चुभ रहे थे। जिस वक्त नगर निगम और प्रशासन की टीम ने उनके कथित अवैध निर्माण को तोड़ा, उसके बाद से यह कयास लगाए जा रहे थे कि जिन अफसरों ने इस तोडफ़ोड़ में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है, उनके खिलाफ देर-सबेर कार्रवाई होगी। रायपुर से पहले ही इस आशय का संकेत दे दिया गया था।

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