

– नरेश सोनी
दुर्ग। कोरोना काल में राजनीतिक गतिविधियां जिस हद तक थम गई थी, अब उतनी ही तेज भी हुई है। राजनीतिक दलों के साथ ही भावी प्रत्याशियों ने भी कागजी दहाड़ लगाना शुरू किया है, जबकि अभी विधानसभा चुनाव को डेढ़ साल का वक्त बकाया है। ऐसे में आज के हालातों में जिले की सभी ६ विधानसभा सीटों का समीक्षात्मक विश्लेषण बताता है कि जिले में कांग्रेस की राह आसान नहीं है। हालात इशारा कर रहे हैं कि यदि भाजपा बेहतर प्रत्याशी दे पाई तो कांग्रेस को यहां मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। छत्तीसगढ सरकार की गांव-किसानों को ध्यान में रखकर बनाई गई योजनाओं की वजह से शहरी इलाकों में पार्टी को नुकसान होता दिखता है।

भूपेश बघेल की अगुवाई में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी तो पूरा फोकस ओबीसी और किसानों पर रहा। लेकिन दुर्ग जिले में ज्यादातर सीटें शहरी परिवेश वाली हैं। ऐसे में प्रदेश सरकार की क्रांतिकारी नीतियों का लाभ इन शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस को मिल पाएगा, इसकी संभावना कम ही है। पिछले कुछ महीनों की गतिविधियों को देखें तो भाजपा का पूरा ध्यान एससी वोटर्स पर रहा है। पहले बस्तर चिंतन, उसके बाद वरिष्ठ नेताओं के लगातार दौरे बताते हैं कि बस्तर से पूरी तरह साफ हो चुकी भाजपा आदिवासी वोटों को सकेलने के लिए किस कदर जद्दोजहद कर रही है। एक ओर जहां कांग्रेसियों में उत्साह है तो भाजपा की सबसे बड़ी चिंता उसके घर बैठे कार्यकर्ता हैं। नगरीय निकाय के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतरीन रहा, लेकिन विधानसभा चुनाव अलग नेतृत्व और मुद्दों पर निर्भर करते हैं, इसलिए निकाय चुनावों को पैमाना मानना फिलहाल बड़ी त्रुटि होगी।
२०१८ के चुनाव में ६ में से ५ सीटें कांग्रेस ने जीतीं। यह पूरी तरह से जनता का भाजपा के खिलाफ दिया गया निर्णय था। बावजूद इसके भाजपा न सबक लेती दिखी, न पुराने पंच-प्रपंचों से छुटकारा पाते। १५ साल की सत्ता के बाद यदि उसका यह हाल रहा तो वर्तमान परिस्थितियों को सहज ही समझा जा सकता है। दरअसल, भाजपा के लिए दुर्ग जिला उस नासूर की तरह है, जहां बड़े नेताओं की गुटबाजी हमेशा टीस देती रहती है। टिकट वितरण की गलतियां इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। २०१८ में दुर्ग शहर और अहिवारा क्षेत्र में भाजपा नेत्री के समर्थकों को टिकट दी गई थी। भाजपा ने ये दोनों चुनाव हारे, परंतु हार की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। भिलाई शहर से तत्कालीन केबिनेट मंत्री और भाजपा के प्रभावशाली नेता प्रेमप्रकाश पाण्डेय खुद चुनाव हार गए। दुर्ग ग्रामीण से जागेश्वर साहू को टिकट दी गई, जिन्हें जनता पहले भी कई बार नकार चुकी थी। पाटन में भाजपा की नहीं चलनी थी तो नहीं ही चली। जिस इकलौती सीट पर भाजपा को जीत मिली, उसकी कहानी तो सिर पीट लेने जैसी है। वैशाली नगर के भाजपाई विधायक विद्यारतन भसीन को निष्क्रिय, अक्षम बताकर एक गुट विशेष ने उनकी टिकट काटने की पुरजोर कोशिश की। यहां तक कि अपने रिश्तेदारों के नाम भी आगे बढ़ाए। अंत में वरिष्ठ नेताओं ने भसीन को ही तवज्जो दी और वही भसीन जिले में भाजपा की नाक बचाने में कामयाब रहे।
अब जबकि भाजपा ने चुनाव से करीब डेढ़ साल पहले ही तैयारियां प्रारम्भ की है तो पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता यह अपेक्षा कर रहे हैं कि पार्टी उन पुरानी गलतियों से बचे, अन्यथा उसे फिर से दिक्कतें हो सकती है। इसके लिए सबसे पहली जरूरत तो दमदार और प्रभावशाली प्रत्याशियों का चयन करना ही होगी। इसमें आने वाले दिनों में भाजपा को खासी दिक्कतें पेश आएंगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिले की भाजपाई राजनीति ने नया नेतृत्व उभारने का चॉस ही नहीं लिया। जब जरूरत पड़ी तो खुद की वरदहस्ती में एक कठपुतली खड़ी कर दी। दुर्ग नगर निगम और पिछला विधानसभा चुनाव इसके सटीक उदाहरण हैं। जिले की ६ सीटों का अवलोकन करें तो यह स्पष्ट दिखता है कि भाजपा के पास इनमें से ज्यादातर सीटों पर जिताऊ उम्मीदवारों का टोटा है।
जिले के पाटन क्षेत्र की बात करें तो यह स्वयं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का निर्वाचन क्षेत्र है। ऐसे में यहां भाजपा की दाल गलती नहीं दिख रही। पिछली दफा यहां से बघेल (कुर्मी) के खिलाफ भाजपा ने साहू प्रत्याशी दिया था। इसका पार्टी को कोई फायदा नहीं हुआ। जातीय समीकरणों को दुर्ग ग्रामीण क्षेत्र में भी अंजाम देने की कोशिश की गई। यहां कांग्रेस के ताम्रध्वज साहू के मुकाबले भाजपा ने भी जागेश्वर साहू को मैदान में उतारा था। यहां भी भाजपा की भद्द पिटी। फिलहाल दुर्ग ग्रामीण क्षेत्र में गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू की स्थिति कुछ कमजोर हुई है। यदि वे बिगड़ती स्थितियों को नियंत्रित नहीं कर पाए तो उनके लिए भी दिक्कतें हो सकती है। वहीं, भिलाई नगर की बात करें तो यहां युवा नेता देवेन्द्र यादव ने जो पैठ बनाई, उस मुकाम को चुनौती देना भाजपा के लिए कठिन होगा। अहिवारा क्षेत्र में सतनामी समाज के गुरू रूद्र कुमार को लेकर स्थानीय स्तर पर नाराजगी दिखने लगी है। भाजपा के लिए यहां गुरू का विकल्प तलाशना बड़ी चुनौती होगी। भाजपा काफी समय से रूद्र गुरू को बाहरी बताती आई है। हालांकि सतनामी समाज को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। इधर, दुर्ग शहर सीट अघोषित समझौते की भेंट चढ़ती रही है। इस बार यहां एंटी इन्कम्बेंसी दिख रही है, लेकिन भाजपा को न केवल इसका फायदा उठाना होगा, अपितु बेहतर प्रत्याशी भी देना होगा। वर्तमान में कांग्रेस के अरूण वोरा दुर्ग का नेतृत्व कर रहे हैं। २०१८ में भाजपा ने यह सीट अरूण वोरा को तश्तरी में सजाकर दी थी। कांग्रेस के लिए दुर्ग ग्रामीण क्षेत्र के हालात भी मुफीद नहीं दिख रहे। भले ही यह गृहमंत्री का क्षेत्र हो, किन्तु मतदाताओं के भीतर कुछ सुलग रहा है। भाजपा यदि इसे हवा दे पाए तो कुछ बात बन सकती है। परिसीमन के बाद हुए तीन चुनावों में से दो बार यहां महिला प्रत्याशी निर्वाचित हुईं हैं। शायद यही वजह है कि इस सीट से किसी महिला को प्रत्याशी बनाए जाने की वकालत हो रही है। वैशाली नगर की बात करें तो यहां भले ही पार्टी के पास जिले का इकलौता विधायक है, किन्तु इस बार संभव है कि यहां प्रत्याशी बदल दिया जाए। यहां नया चेहरा देने से पार्टी को फायदा होने की गु्जाइश बढ़ सकती है। वैसे भी, वैशाली नगर क्षेत्र को भाजपा का ही गढ़ माना जाता है।
