हे भ्रष्टाचार के गुरू घंटालो, गुरू पूर्णिमा पर तुम्हें भी नमोस्तु!

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आज गुरू पूर्णिमा है और यह संयोग ही है कि ऐसे पुनीत अवसर से पहले कांग्रेस और भाजपा की अलग-अलग हुई प्रदेश स्तरीय बैठकों से कई संदेश और संकेत निकलकर आए। भाजपा कोरग्रुप की भिलाई में हुई बैठक में जिस तरह से प्रदेश में मोदी की अगुवाई में चुनाव लडऩे का ऐलान हुआ, उसके बाद यह स्पष्ट हो गया कि भाजपा के प्रादेशिक नेतृत्व ने बड़ी विनम्रता के साथ डॉ. रमन सिंह को विदाई दे दी। यह विदाई कुछ वैसी ही है, जैसी राष्ट्रीय स्तर पर कभी लालकृष्ण आडवाणी, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह और मुरली मनोहर जोशी जैसे धाकड़ नेताओं को दी गई। इन नेताओं से अलग डॉ. रमन की छबि एक नम्र और संतोषी नेता के रूप में रही। जिसे जनता से लगातार प्रेम, समर्थन और आशीर्वाद मिला।

भाजपा से इतर, कांग्रेस की प्रादेशिक बैठक में खुद मुख्यमंत्री ने खुला संदेश दिया कि कोई नेता पार्टी को नहीं चला रहा है, बल्कि पार्टी से वह खुद चल रहा है। यह संदेश उन नेताओं के लिए खास है, जो कांग्रेस को अपने बाप-दादाओं की जागीर समझे बैठे हैं और अपने आसपास एक काकस बनाकर दीगर कार्यकर्ताओं को दुत्कारते रहते हैं। …तो गुरू पूर्णिमा में दोनों दलों के लोगों को जो राजनीतिक संदेश मिला है, उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं को ग्रहण करना चाहिए। वैसे, प्रदेश में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अगुवाई में अच्छा काम चल रहा है, लेकिन उनके काम और सरकार की योजनाओं को स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार का दीमक चाट रहा है। कांग्रेस के स्थानीय नेता जिस तरह से अंधा बाँटे रेवडी की तर्ज पर काम कर रहे हैं, उसने भी प्रदेश की भूपेश बघेल सरकार के कामकाज पर पलीता लगाया है।

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दुर्ग में यदि कांग्रेस बेहद खराब स्थिति में है तो इसकी सबसे बड़ी वजह स्थानीय नेतृत्व ही है। वर्तमान में यदि दुर्ग में कांग्रेस की स्थिति दयनीय बताई जा रही है तो उसकी वजह भी स्थानीय नेताओं की कार्यप्रणाली और उनका पक्षपातपूर्ण रवैय्या है। इन नेताओं ने मिलकर जिस तरह से नगर निगम को चारागाह बनाकर रखा हुआ है, उससे पूरे शहर की व्यवस्था चौपट हो गई है। स्थानीय विधायक के लोग चखना सेंटर सेंटर चला रहे हैं, शौचालयों के जरिए अपनी जेबें भर रहे हैं, कई-कई फर्म बनाकर नगर निगम के ठेके ले रहे हैं, उनके पारिवारिक लोग भ्रष्टाचार के खेल में आकंठ डूबे हुए हैं। महत्वपूर्ण पदों पर बैठे नगर निगम के नेता अपना-अपना हिस्सा लेकर कबूतर की तरह आंखें बंद किए बैठे हैं। शहर बर्बा0द होता है तो हो जाए। लोगों को मूलभूत सुविधाएं भी मयस्सर नहीं है तो न रहे।

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर जिस तरह से सेंसरशिप थोपी गई है, उसका दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है। खुद को पार्टी का सर्वेसर्वा साबित करने के फेर मे स्थानीय विधायक ने न केवल नगर निगम में डमी महापौर बिठाया, बल्कि शहर संगठन में भी डमी अध्यक्ष थोप दिया। महापौर शहर का सिरमौर होता है, लेकिन दुर्ग के महापौर को मीडिया में बयान जारी करने और खुद होकर शहर का दौरा करने तक का अधिकार नहीं है। रबर स्टैम्प की तरह महापौर को रोजाना विधायक के यहां हाजिरी लगानी होती है। समय-समय पर अपना लोकेशन भी बताते रहना होता है। इसलिए कि कहीं नेताजी नाराज न हो जाएं। दुर्ग नगर निगम में इतने खराब हालात पहले कभी नहीं रहे। दस वर्षों तक नगर निगम की महापौर रहने के बाद जब सुश्री सरोज पाण्डेय ने एक अपरिवक्व व अराजनैतिक व्यक्ति डॉ. शिवकुमार तमेर को महापौर बनवाया, तो उन्होंने भी कभी इतने हस्तक्षेप नहीं किए। डॉ. तमेर के बाद चंद्रिका चंद्राकर महापौर निर्वाचित हुईं, तब भी सुश्री पाण्डेय ने दबाकर रखने और प्रत्येक कार्य में हस्तक्षेप करने से गुरेज किया। लेकिन कांग्रेस का बहुमत आने के बाद सबसे पहले यह तलाश प्रारम्भ हुई कि कौन सा पार्षद सिर और आंखें झुकाकर रखने वाला है।

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शहर संगठन का काम ही जनविरोधी नीतियों का प्रतिकार करना है, चाहे वह दूसरे राज्य का मसला हो या फिर केन्द्र सरकार का। विडंबना है कि शहर संगठन के नेताओं को भी मुंह खोलने या कहें मीडिया तक पहुंचने की अनुमति नहीं है। यदि कोई नेता अपने स्तर पर कोई बयान दे भी देता है तो उसकी पद्मनाभपुर बंगले में पेशी हो जाती है। आज यदि शहर में एक गुट विशेष के कार्यकर्ता सिर्फ जन्मदिन मनाने तक सीमित होकर रह गए हैं तो उसके लिए भी स्थानीय नेता और उनके भीतर का डर जिम्मेदार है। विधायक गुट से अलग बाकी के जमीनी कार्यकर्ता वर्तमान हालातों से बेहद खफा हैं। नेताजी से जुड़े लोगों को न पार्टी से कोई वास्ता है, न संगठन से। ये लोग सिर्फ माल समेटने में लगे हैं। शायद उन्हें भी अहसास है कि अगली दफा शायद मौका न मिले।

…तो नगर निगम को चारागाह बनाकर रखने वाले घंटालो, गुरू घंटालों और महाघंटालों, आप सभी को भी गुरू पूर्णिमा पर नमोस्तु।

– नरेश सोनी
सम्पादक

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