दुर्ग/भिलाई40 मिनट पहले
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दुर्ग में सिंधी समाज के बच्चों को शहीद कालाणी की जीवनी बताई गई।
राष्ट्रभक्ति की मिसाल और देशवासियों के लिए स्वदेशी अपनाओ का नारा बुलंद करने वाले अमर शहीद हेमू कालाणी का 80वां शहीदी दिवस ट्विनसिटी में शनिवार को सिंधी समाज ने मनाया। इस अवसर पर उनकी शहादत और कुर्बानियों की गाथा सदस्यों को सुनाई गई। भजन संध्या में उनकी देशभक्ति और वीर गाथा गीत, संगीत व कविताओं के साथ प्रस्तुत किया गया। समाज के बच्चों ने नाटक के माध्यम से उनकी जीवनी को बताया। दुर्ग समेत भिलाई हाउसिंग बोर्ड और वैशाली नगर में आयोजन हुआ।
आदर्श सिन्ध ब्रादर मंडल हाउसिंग बोर्ड भिलाई में समाज की महिलाओं व बच्चों ने देशभक्ति और शहीद की वीर गाथा के गीत, भजन गाकर श्रद्धाजंलि अर्पित की। उनकी जीवनी से जुड़े प्रसंगों पर अभिनय किया। शहीद कालाणी जिंदाबाद और अमर रहे के नारे लगाए। वहीं वैशालीनगर में सिंधी पंचायत के वरिष्ठों ने शहीद की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।
सिंधी पंचायत ने चौक में मूर्ति पर चढ़ाए फूल
श्रीराम सिंधी पंचायत वैशाली नगर के पदाधिकारियों ने शहीद हेमू कालानी चौक वैशाली नगर ने सिंध के वीर सपूत अमर शहीद हेमू कालानी को श्रद्धांजलि अर्पित की। हेमन नागदेव, दयाराम बत्रा ने बताया कि स्वतंत्रता के बाद संसद परिसर में शहीद हेमू की प्रतिमा स्थापित हुई और सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया। भीमसेन सेतपाल, मंगतराम धनवानी, प्रताप गोदवानी, दिलीप पवानी, धर्मदास बत्रा, लक्ष्मण बक्तानि उपस्थित थे।
सिंधुड़ी सेवा समिति ने शहीद को किया नमन
सिंधुड़ी सेवा समिति दुर्ग द्वारा अमर शहीद हेमू कालाणी बलिदान दिवस पर सिंधु भवन में कार्यक्रम रखा। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के उपाध्यक्ष आरएन वर्मा, पूज्य सिंधि जनरल पंचायत अध्यक्ष मुरली सचदेव, छग राज्य सिंधी साहित्य अकादमी सदस्य राजकुमार नारायणी, सिंधुड़ी सेवा समिति अध्यक्ष महेश गणेशानी ने शहीद हेमू कालाणी की जीवनी पर प्रकाश डाला। नमन किया। छात्र-छात्राओं ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी।
शहीद ने प्राण दिए पर अंग्रेजों को साथियों के नाम नहीं बताए
समाज के अध्यक्ष डॉ. धर्मेंद्र कृष्णानी ने बताया कि हेमू कालाणी क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे। काफी कम उम्र में उन्होंने अपने साथियों के साथ विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और लोगों से स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने का आग्रह किया। सन् 1942 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदाेलन में हेमू भी शामिल हुए।
उन्होंने अंग्रेजी सेना के हथियारों से भरी रेलगाड़ी को रोकने अपने साथियों के साथ रेल पटरी को अस्त व्यस्त करने की योजना बनाई। पुलिस की नजर उन पर पड़ गई। हेमू कालाणी को गिरफ्तार कर लिया। कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई। उस समय के सिंध के गणमान्य लोगों ने पिटीशन दायर कर वायसराय से उनको फांसी की सजा न देने की अपील की। वायसराय ने शर्त रखी कि वह अपने साथियों का नाम और पता बताए, लेकिन हेमू कालाणी ने अस्वीकार कर दी। 21 जनवरी 1943 को उन्हें फांसी दे दी गई।
