– नरेश सोनी
दुर्ग। हाल ही में हुए नव संकल्प शिविर और उसके बाद केन्द्र की अग्निपथ योजना के विरोध में आयोजित कार्यक्रम, भविष्य के लिए कई तरह के संकेत दे रहे हैं। नव संकल्प शिविर में कार्यकर्ताओं की नाराजगी खुलकर फूटी थी तो अग्निपथ के विरोध में जुटे मु_ीभर कार्यकर्ता यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि प्रदेश सरकार का पिछला सर्वे सच्चाई से दूर नहीं था।
केन्द्र सरकार की नई अग्निपथ योजना का विरोध पूरे प्रदेश में जोरदार तरीके से किया गया। पड़ोस के संगठन जिले भिलाई में जहां युवाओं की अपार भीड़ जुटी तो दुर्ग ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र में भी जबरदस्त माहौल नजर आया। लेकिन इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों से इतर, दुर्ग में कांग्रेस के उंगलियों में गिने जाने योग्य लोग ही जुट पाए। इनमें भी युवाओं की संख्या लगभग नगण्य थी। जो दो-चार युवा नजर आए, वे भी सेल्फी लेने और फोटो खिंचवाने तक ही सीमित रहे। गौरतलब है कि अग्निपथ विरोध संबंधी कार्यक्रम के प्रभारी स्वयं विधायक व दर्जा प्राप्त मंत्री अरूण वोरा थे।
कुछ समय पहले प्रदेश सरकार ने सरकारी स्रोतों से विधायकों के परफारमेंस की पड़ताल करवाई थी। इस पड़ताल में सामने आया कि कांग्रेस के ७० में से करीब ३५ विधायकों की स्थिति खराब है। यानी इन विधायकों के जीतने की संभावना या तो कम है या नहीं है। दुर्ग के विधायक अरूण वोरा का नाम भी खराब परफारमेंस वाले विधायकों में शुमार था। जाहिर है कि अन्य विधायकों की तरह दुर्ग विधायक अरूण वोरा को भी छवि सुधारने की नसीहत दी गई थी। लेकिन इन कुछ महीनों में दुर्ग विधायक ने अपनी छवि सुधारने की दिशा में कोई भी काम किया हो, ऐसा कहीं नजर नहीं आया। अलबत्ता, उनकी मौजूदगी वाले कार्यक्रमों में कार्यकर्ताओं की संख्या कम से कमतर होती चली गई। कार्यकर्ताओं में उनके खिलाफ बढ़ती नाराजगी का दमन करने की कोशिश भी हुई, किन्तु नाराजगी दूर करने और दबा देने में बड़ा अंतर होता है।
दरअसल, युवक कांग्रेस के संगठन चुनाव में विधायक और उनके समर्थकों ने जिस तरह से शहर के अन्य युकां नेताओं को दरकिनार किया, उन्हें अलग-थलग करने की चेष्टा की गई और मानसिक रूप से परेशान भी किया गया, उसके बाद इस बात की गुंजाइश कम ही है कि युवा साथी, विधायक के पक्ष में काम करेंगे। दुर्ग में युकां का चुनाव लडऩे वालों का साफ कहना है कि वे दीगर क्षेत्रों में काम करने को तैयार है, लेकिन दुर्ग में काम उनसे न हो पाएगा।
शहर में चुनावी माहौल गरमाने लगा है। वक्त की जरूरत है कि जनता को ज्यादा से ज्यादा विकास कार्यों का आश्वासन परोसा जाए। रोजाना भूमिपूजन, लोकार्पण और निर्माण के काम हो रहे हैं। विधायक अरूण वोरा स्वयं रोजाना विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं और जनता से प्रत्यक्ष संवाद भी कर रहे हैं। लेकिन इन तमाम स्थितियों, परिस्थितियों के बीच स्थानीय नेताओं ने जनता का मन टटोलने की जहमत नहीं उठाई। विधायक जिन कार्यों का श्रेय लेते नहीं थकते, उन्हीं कार्यों की वजह से आम नागरिक बेहद परेशान हैं। अमृत मिशन की भेंट चढ़ी सड़कें लोगों के खाना पचाने के काम आ रही है, क्योंकि वाहन लेकर निकलने पर प्रत्येक चंद कदमों पर हिचकोले खाने को मिलते हैं। वर्तमान में शहर की सबसे बड़ी समस्या पेयजल की है। पानी की टंकियां खड़ी कर दी गई, लेकिन उन टंकियों में पानी कैसे पहुंचे, इसकी कोई योजना नहीं बनाई गई। अब शहर के नागरिक नगर निगम का ही पानी पी-पीकर विधायक और नगर निगम की परिषद को कोस रहे हैं।
घर बैठे प्रेस विज्ञप्तियां जारी करने वाले विधायक शायद अब तक नागरिक-समस्याओं को संजीदगी से नहीं ले पाए हैं। उनके करीबियों का ही कहना है कि नेताजी अपनी या अपने कार्यों की वजह से नहीं बल्कि विरोधी दल के सहयोग से जीतते हैं। हालांकि इस बार विरोधी दल में भी हालात बदले हुए हैं। भाजपा में नए जिलाध्यक्ष की नियुक्ति के बाद विरोधियों के सहयोग-द्वार भी बंद होते दिख रहे हैं। पार्टी के ही भीतर लगातार शत्रु बढ़ा रहे विधायक को पता नहीं इन हालातों से चिंतित होना चाहिए या नहीं, लेकिन कांग्रेस के कई लोग यहां तक दावा करने लगे हैं कि अंतिम समय में विधायक वोरा की टिकट काटी भी जा सकती है। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार आने के बाद दुर्ग शहर में कई बड़े नेताओं का उदय हुआ है। कभी हाशिए पर रखे जाने वाले ये सभी नेता मुख्यमंत्री के करीबी और खास समर्थक हैं। ऐसे में इस संभावना को नकारा भी नहीं जा सकता कि दुर्ग में पार्टी नया प्रत्याशी उतार दे। वास्तव में, प्रदेश में दोबारा सरकार बनाने के लिए खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं। एक-एक सीट को मजबूत करने की कोशिशें जारी है।
कांग्रेसी सूत्रों का कहना है कि टिकट वितरण से पूर्व यदि पार्टी को लगता है कि दुर्ग का प्रत्याशी कमजोर है, तो उसे बदलने में कोई गुरेज नहीं होगा। एक समय था जब पूरे छत्तीसगढ़ में सिर्फ एक सीट पर कोई बच्चा भी बता सकता था कि प्रत्याशी कौन होगा। वह सीट दुर्ग की ही थी और वजह थी कि वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा दिल्ली में बैठकर खेल किया करते थे। अरूण वोरा जब लगातार तीन विधानसभा चुनाव हारे, तब भी उनकी टिकट पहले से ही तय रही। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। पार्टीजनों का साफ कहना है कि यदि वर्तमान प्रत्याशी को रिपीट किया गया तो कांग्रेस के लिए मुश्किल होगी। यह तो भविष्य ही बताएगा कि क्या होता है।
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