खैरागढ़ विश्वविद्यालय में फाइन आर्टस के विद्यार्थियों ने लगाई इंस्टॉलेशन कला की प्रदर्शनी

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० ‘प्लास्टिक के जाल में दम तोड़ती ग्रामीण संस्कृति के दर्द’ को दिखाया

० कुलपति प्रो.(डॉ.) लवली शर्मा ने छात्रों के नवाचार की सराहना की

खैरागढ़। इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय परिसर एक में एमएफए के विद्यार्थियों ने इंस्टॉलेशन कला की प्रदर्शनी लगाई। इस प्रदर्शनी में ‘प्लास्टिक के जाल में दम तोड़ती ग्रामीण संस्कृति के दर्द’ को दिखाया गया। मास्टर ऑफ फाइन आर्ट्स (एमएफए) प्रथम वर्ष के छात्र अनमोल गोयल द्वारा प्रदर्शित इस कला स्थापना ने अपनी सादगी, प्रतीकात्मकता और सामाजिक संदेश से दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया।

*परंपरा और आधुनिकता के संगम का संदेश*

प्रदर्शनी का उद्देश्य केवल समस्या को उजागर करना नहीं बल्कि उसके समाधान की दिशा भी दिखाना था। कलाकार ने यह रेखांकित किया कि खैरागढ़ के स्थानीय बांस शिल्पकार अपनी पारंपरिक कला में दक्ष होने के साथ-साथ आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढालने का प्रयास कर रहे हैं। प्रदर्शनी में बांस से निर्मित घड़ियां, आकर्षक लाइट लैंप, आधुनिक फर्नीचर, बच्चों के खिलौने और मिनिएचर कलाकृतियां प्रदर्शित की गईं। इन कृतियों के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि यदि पारंपरिक शिल्प में आधुनिकता का समावेश किया जाए तो ग्रामीण कलाकार न केवल आत्मनिर्भर बन सकते हैं बल्कि आर्थिक रूप से भी सशक्त हो सकते हैं। यह प्रयास बांस कलाकारों के लिए नई पहचान और रोजगार के अवसरों का मार्ग प्रशस्त करने वाला माना जा रहा है।

*बांस की झोपड़ी और प्लास्टिक का जंजाल बना आकर्षण का केंद्र*

इंस्टॉलेशन का मुख्य आकर्षण बांस से निर्मित एक झोपड़ीनुमा घर था जिसे स्थानीय बांस कलाकारों के सहयोग से तैयार किया गया। इस पारंपरिक संरचना को चारों ओर से काले प्लास्टिक और पन्नियों से ढंककर यह दर्शाया गया कि किस प्रकार प्लास्टिक और आधुनिक उपभोक्तावाद प्राकृतिक जीवनशैली एवं हस्तशिल्प परंपराओं को धीरे-धीरे निगल रहे हैं। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित विश्वविद्यालय की कुलपति महोदया प्रो.(डॉ.) लवली शर्मा ने छात्रों के नवाचार की सराहना करते हुए कहा कि जब कला सामाजिक समस्याओं को स्वर देने के साथ-साथ कलाकारों के आर्थिक उत्थान का माध्यम बनती है तभी उसकी सार्थकता सिद्ध होती है।

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*कलाकार का दृष्टिकोण: लुप्त होती पहचान और भविष्य की चिंता*

अपने कॉन्सेप्ट नोट में कलाकार अनमोल गोयल ने बताया कि काले प्लास्टिक से ढकी झोपड़ी इस बात का प्रतीक है कि आधुनिक प्लास्टिक संस्कृति धीरे-धीरे पारंपरिक कारीगरों की पहचान को समाप्त कर रही है। उन्होंने कहा कि यदि इन कलाकारों की कलाओं को आधुनिक बाजार से नहीं जोड़ा गया तो वे पलायन के लिए मजबूर हो जाएंगे। उनके अनुसार पारंपरिक शिल्प में आधुनिक उपयोगिता और डिजाइन का समावेश ही इस संस्कृति को बचाने का प्रभावी उपाय है। इस दौरान इंस्टॉलेशन के साथ चित्रकला प्रदर्शनी भी लगाई गई जिसमें बांस कलाकारों के पारिवारिक जीवन, संघर्ष और सामाजिक परिस्थितियों को मिक्स मीडिया, चारकोल तथा अन्य माध्यमों के जरिए अभिव्यक्त किया गया। इन चित्रों ने दर्शकों को कलाकारों के जीवन के आंतरिक और बाहरी संघर्षों को समझने और महसूस करने का अवसर प्रदान किया।

*सामूहिक प्रयास से साकार हुई प्रदर्शनी*

इस जटिल कला स्थापना को सफल बनाने में कलाकार के छात्रावास मित्रों और सहपाठियों का विशेष योगदान रहा। छात्रों ने दिन-रात मेहनत कर इंस्टॉलेशन को आकार दिया जो उनके सामूहिक समर्पण और कला के प्रति गहरे लगाव को दर्शाता है। यह केवल एक छात्र की कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन नहीं था बल्कि पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण हस्तशिल्प के संवर्धन और पारंपरिक कलाओं को आधुनिक स्वरूप में पुनर्जीवित करने का एक सशक्त संदेश भी था।

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