भिलाई में शिव पुराण कथा का समापन, पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा–संस्कार विहीन शिक्षा का कोई अर्थ नहीं

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भिलाई, 1 म‌ई। श्री शिव महापुराण, भक्ति और मुक्ति की कथा है। श्रीराम जन्मोत्सव समिति एवं जीवन आनंद फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एकांतेश्वर महादेव शिव महापुराण की कथा के समापन दिवस पर विश्वविख्यात कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने भक्तों को शिव की अविरल भक्ति शिव तत्व को धारण करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मृत्यु लोक में एक न एक दिन सभी को इस देह का त्याग करना है इस संसार को छोड़ना हैं, तो कुछ ऐसा करके जाएं कि दुनिया से जाने के बाद भी लोग आपका स्मरण कर सकें आपको याद रख सकें। इस संसार में भोलेनाथ की भक्ति से बड़ा सुख और मोक्ष दूसरा नहीं हैं।

भारत की संस्कृति हैं अतिथि देवो भव का,
अपनी कथा में सदैव ही आचरण और संस्कार की शिक्षा देने वाले मिश्रा जी ने कहा कि हमारी सनातन की संस्कृति हैं अतिथि देवो भव। घर में आये हर व्यक्ति का आदर, सत्कार करना हमारा कर्तव्य हैं। घर में पधारें हर व्यक्ति में नारायण का स्वरूप होता है। नर में ही नारायण हैं का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपने आचरण, व्यवहार, कर्म, वाणी से कभी किसी को दुख, कष्ट नहीं देना चाहिए। पंडित मिश्रा ने कहा कि गृहस्थ जीवन का सबसे बड़ा कर्म पति – पत्नी का एक साथ बैठकर धार्मिक अनुष्ठान करना है। एक साथ भगवान की अविरल भक्ति करना है। अपने दैनिक जीवन के कर्मों से थोड़ा समय निकाल कर नियमित रूप से भगवान का भजन करना चाहिए। अंतिम दिन की कथा में विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष नारायण चंदेल, राजनांदगांव से लोकसभा सांसद संतोष पांडेय, पूर्व सांसद मधुसूदन यादव उपस्थित रहे।पंडित मिश्रा ने कहा कि शिव महापुराण की कथा में वर्णित हैं मनुष्य अपने जीवन में जितने ऊँचाई पर जाता हैं उसे उतना ही विनम्र होना चाहिए। नम्रता, विनम्रता, संस्कार ही आपकी शिक्षा को परिलक्षित करते हैं। ऊँचे पदों पर जाने के बाद अगर आपको बडों को नमन करने, उनका आदर करने, नम्रता से बात करने की समझ नहीं हैं तो आपकी शिक्षा बेकार हैं अर्थहीन है। उन्होंने कहा कि भूगोल पढ़कर देश की सीमा का और इतिहास पढ़कर धर्म और देश की रक्षा करने वालों का ज्ञान रखे जीवन की बारीकियां उनसे सीखें। अपनी शिक्षा और संस्कार से दुनिया को कुछ देने का प्रयत्न करें। पिता अपने पुत्र को अच्छे कपड़े, अच्छे स्कूल, अच्छी ट्यूशन, अच्छी महंगी किताब, अच्छा भोजन, महंगा बिस्तर देता हैं लेकिन अगर वो अच्छे संस्कार नहीं दे पाता हैं तो फिर सारी चीज़ें व्यर्थ हो जाती हैं। संस्कारविहीन शिक्षा का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

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