छत्तीसगढ़ के सभी विश्वविद्यालयों मे एमए में छत्तीसगढ़ी विषय प्रारम्भ करना मेरी पहली प्राथमिकता: कुंवर सिंह निषाद
भिलाई,9 जुलाई। छत्तीसगढ़ चिन्हारी साहित्य समिति भिलाई द्वारा वर्ष 2023 का चिन्हारी सम्मान शिक्षाविद एवं साहित्यकार डॉ. दीनदयाल दिल्लीवार को दिया गया। वे अंचल के सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. तेजराम दिल्लीवार के ज्येष्ठ सुपुत्र हैँ। छत्तीसगढ़िया की प्रतीक धोती और पगड़ी, अहिंसा के प्रतीक गाँधीजी और उनका चरखा, सुख- दुःख के प्रतीक सुवा, सुनहरे धान की बालियां, प्रशस्ति पत्र एवं सम्मान निधि के रूप मे ग्यारह हजार रूपये समिति द्वारा प्रदान कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ की कुलपति एवं छत्तीसगढ़ की स्वर-कोकिला पद्मश्री डॉ. ममता चंद्राकर ने कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि दुःख होता है कि हम अपने छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। इन्हे सहेजकर रखने की आवश्यकता है। चिन्हारी साहित्य समिति यह आयोजन पूरी तरह छत्तीसगढ़ी परम्परा एवं संस्कृति का निर्वहन करते हुए कर रही है। इस आयोजन को देखकर एक सुखद अनुभूति हो रही है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के कुलसचिव डॉ. भूपेंद्र कुलदीप ने कहा कि आज के इस दौर में छत्तीसगढ़ अंचल में छत्तीसगढ़ी भाषा में साहित्य की प्रत्येक विधा का सृजन हो रहा है। फिर भी आने वाले भविष्य में ऐसे साहित्यिक रचना की आवश्यकता है जो साहित्य जगत में छत्तीसगढ़ी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर सके और मुझे पूरी उम्मीद है कि वह दिन भी जरूर आएगा ज़ब छत्तीसगढ़ी भाषा राष्ट्रीय स्तर पर अपना स्थान बनाने मे कामयाब होगी।
विशेष अतिथि कुंवर सिंह निषाद, संसदीय सचिव एवं विधायक, गुंडरदेही ने कहा कि अब समय आ गया है कि हम अपनी छत्तीसगढ़ी भाषा को अधिक से अधिक प्रचारित-प्रसारित करें। इसके लिए छत्तीसगढ़ी भाषा में एमए की कक्षाएं प्रारम्भ करवाने एवं इनके विद्यार्थियों को रोजगार उपलब्ध कराना मेरी पहली प्राथमिकता होगी।
वक्ता के रूप मे डॉ. राजेश श्रीवास, अधिष्ठाता, अध्ययन मण्डल हिंदी, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर ने चिन्हारी समिति के संयोजक दुर्गाप्रसाद पारकर द्वारा रचित छत्तीसगढ़ी उपन्यास “बहु हाथ के पानी” पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह उपन्यास छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित एक बेहतरीन उपन्यास है।डॉ. मृदुला सिंह, अधिष्ठाता, हिंदी अध्ययन मण्डल, संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय, सरगुजा ने छत्तीसगढ़ी नाटकों पर चर्चा करते हुए दुर्गा प्रसाद पारकर के नाट्य संग्रह “सुराजी गांव” के सन्दर्भ में अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि संग्रह मे “सुराजी गांव” शीर्षक के ठीक नीचे छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी – नरवा, गरवा, घुरुवा औऱ बारी लिखा है, जो शीर्षक को बखूबी स्पष्ट करने में सहायक है। डॉ. डीएस ठाकुर, अधिष्ठाता, हिंदी अध्ययन मण्डल, अटलबिहारी बाजपेयी विश्वविद्यालय, बिलासपुर ने पारकर की नयी कविता “सिधवा झन समझव” तथा कविता संग्रह “सुमिरव छत्तीसगढ़” पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि पारकर ने हिंदी की नयी कविता के तर्ज़ पर छत्तीसगढ़ी भाषा मे “सिधवा झन समझव” जैसा कविता संग्रह देकर एक अभिनव पहल किया है। विशेष अतिथ डॉ. विद्या चंद्राकर, अध्यक्ष, राज्य शैक्षिक अनुसन्धान परिषद, रायपुर ने दुर्गा प्रसाद पारकर के निबंध संग्रह “चिन्हारी” औऱ लोक आस्था के पर्व – “जोत जंवारा” पर अपना मत प्रकट किया। “जोत जंवारा” छत्तीसगढ़ की धार्मिक आस्थाओं को प्रकट करने वाला एक विशेष संग्रह है एवं रोचक भी है। विशेष अतिथि डॉ. अभिनेष सुराना, अधिष्ठाता, हिंदी अध्ययन मण्डल, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग ने दुर्गा प्रसाद पारकर का छत्तीसगढ़ी साहित्य में अवदान पर अपने विचार प्रकट किए।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में प्रसिद्ध लोकगायिका रजनी रजक ने राज्य गीत प्रस्तुत किया। सुप्रसिद्ध लोकगायिका पूनम विराट की लोक गीतों की प्रस्तुति ने आयोजन को एक सूत्र मे पिरो दिया। छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, कवि एवं गायक सीताराम साहू ‘श्याम’ ने अपने चिर-परिचित अंदाज मे मंच संचालन किया। डॉ. हंसा शुक्ला प्राचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय द्वारा आभार प्रदर्शन किया गया।
