
दुर्ग न्यूज, 7 फरवरी। छत्तीसगढ़ में आरक्षण को लेकर चल रहे विवाद में हाईकोर्ट ने राज्यपाल सचिवालय को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। आरक्षण के मुद्दे पर राज्य सरकार और हाईकोर्ट एडवोकेट हिमांक सलूजा ने याचिका दायर की थी। जिस पर आज सुनवाई हुई। राज्य सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल पैरवी करने पहुंचे थे।

सोमवार को जस्टिस रजनी दुबे की सिंगल बेंच में मामले की सुनवाई हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए अपनी दलील दी। उन्होंने कोर्ट के सामने कहा कि राज्यपाल को विधेयक सीधे तौर पर रोकने का कोई अधिकार नहीं है। आर्टिकल 200 के तहत राज्यपाल को या तो अनुमति देनी चाहिए या तो इंकार करना चाहिए या फिर राष्ट्रपति को भेजना चाहिए। जिस पर कोर्ट ने राज्यपाल सचिवालय को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब प्रस्तुत करने के लिए कहा है।
इस प्रकरण में राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के साथ ही महाधिवक्ता सतीशचंद्र वर्मा ने अपना पक्ष रखा। वहीं हिमांक सलूजा की तरफ से हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट डॉ. निर्मल शुक्ला और शैलेंद्र शुक्ला ने अपने तर्क प्रस्तुत किए।
ज्ञात हो कि विगत दिसंबर में राज्य सरकार ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर सर्वसम्मति से आरक्षण बिल पारित किया था। इस बिल में अनुसूचित जनजाति के लिए 32 फीसदी, ओबीसी के लिए 27 फीसदी, अनुसूचित जाति के लिए 13 फीसदी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 4 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

बिल को हस्ताक्षर के लिए राज्यपाल के पास भेजा गया। लेकिन राज्यपाल अनुसूईया उइके ने बिल पर साइन करने से इंकार कर दिया है। उन्होंने बिल को लेकर राज्य सरकार से 10 सवाल पूछे थे। जिस पर सरकार द्वारा जवाब राजभवन भेजा गया लेकिन राजभवन का दावा है कि सरकार ने अभी भी कई सवालों के जवाब उन्हें नहीं भेजे हैं।
