शोएब को बचाने में लगी नगर निगम की भ्रष्ट लॉबी!

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मामला कंडम वाहनों में डीजल डलवाने के नाम पर भ्रष्टाचार का

दुर्ग। न फाइलें खंगाली गई, न ही कोई जांच हुई और हर महीने होने वाले लाखों रूपयों के भ्रष्टाचार का मामला रफा-दफा कर दिया गया। जीएफ न्यूज ने पिछले दिनों इस आशय की खबर प्रकाशित की थी कि किस तरह कंडम गाडिय़ों में सैकड़ों लीटर डीजल की खपत दिखाकर नगर निगम को आर्थिक चोंट पहुंचाई जा रही है। बताया जा रहा है कि खबर के बाद नगर निगम की भ्रष्ट लॉबी लोककर्म विभाग के भ्रष्ट कारनामों को दबाने और विभाग प्रभारी को बचाने में लगी रही। पूरे मामले को सिरे से ही खारिज कर दिया गया, जबकि इसी विभाग से जुड़े सूत्रों का दावा है कि इतने व्यापक पैमाने पर की गई गड़बड़ी में कई बड़े नेता और अधिकारी भी शामिल हैं।

जिस विभाग में मेकेनिकल इंजीनियर स्तर का अफसर पदस्थ किया जाना चाहिए था, वहां एक अदने से राजस्व निरीक्षक को लोककर्म विभाग का प्रभारी बना दिया गया। जिस शोएब अहमद नामक के युवा को लोककर्म का प्रभार दिया गया, उसके पास इस विभाग से संबंधित कोई भी अनुभव नहीं था। बावजूद इसके यह कारनामा करीब सालभर पहले नगर निगम की ही भ्रष्ट व्यवस्था ने अंजाम दिया। शोएब की नियुक्ति से पहले तक नगर निगम को हर महीने वाहनों में डीजल भरवाने पर लगभग १० लाख रूपए खर्च करने पड़ते थे, लेकिन जिस तरह से भ्रष्टाचार बढ़ता चला गया, उसके बाद यह राशि १६ से १८ लाख तक पहुंच गई। जानकारों के मुताबिक, लम्बे समय से कर्मशाला के उन वाहनों में भी डीजल डलवाया जाता रहा है, जो या तो कंडम होकर खड़े हैं या फिर खराब पड़े हैं। जिन वाहनों में डीजल डलवाया भी गया तो उसकी खपत भी ज्यादा बताई गई। जाहिर है कि खड़े वाहनों में डीजल डलवाने के नाम पर खुलकर भ्रष्टाचार किया गया। इसी आधार पर हर महीनों लाखों रूपयों का खुला खेल चलता रहा। इस पूरे मामले में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से लेकर कई अफसरों की भूमिका तो संदेहास्पद रही ही, विभाग के एमआईसी प्रभारी पर भी उंगलियां उठी। बात सिर्फ डीजल के नाम पर घोटाला करने की ही नहीं है, बताया जाता है कि नगर निगम के वाहनों में आने वाली छिटपुट खराबी पर भी हजारों रूपयों के बिल बनाकर जमा करवाए गए। आशय यह कि कई कार्य जो सौ-पचास रूपए में होने वाले थे, उन पर हजारों रूपए व्यय होना दिखाया गया। हालांकि सूत्रों का दावा है कि अब गड़बडिय़ों को नियंत्रित कर लिया गया है।

इधर, मीडिया में भ्रष्टाचार की खबर सार्वजनिक होने के बाद अचानक ही नगर निगम की भ्रष्ट लॉबी सक्रिय हो गई और मैनेजमेंट भी शुरू कर दिया गया। एक ओर जहां भ्रष्ट लॉबी मैनेजमेंट में जुटी रही तो दूसरी ओर नवनियुक्त आयुक्त प्रकाश सर्वे और महापौर धीरज बाकलीवाल ऐसे किसी भ्रष्टाचार को ही नकारते रहे। सवाल यह भी है कि यदि भ्रष्टाचार नहीं हुआ तो लोगों को मैनेज क्यों किया गया? इस पूरे मामले को दबाने में जिन लोगों ने अहम् भूमिका निभाई उनमें निगम कमिश्नर के आसपास रहने वाले एक युवा का नाम सामने आ रहा है, इसके अलावा भवन अनुज्ञा शाखा के एक अधिकारी पर भी उंगलियां उठ रही है।

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नगर निगम में सत्ता परिवर्तन के बाद अचानक ही भ्रष्टाचार का ग्राफ इस कदर चढ़ा कि कोई भी विभाग इससे अछूता नहीं रह पाया। इसे नगर निगम के नेतृत्वकत्र्ता महापौर धीरज बाकलीवाल की नाकामी कहें या अनुभवहीनता कि उनके आसपास रहने वाले ही भ्रष्टाचार की दलदल में कुलांचे भरते रहे। महापौर इसलिए भी शांत रहे कि उन्हें उनका हिस्सा लगातार मिलता रहा। यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि शहर में नगर निगम के जरिए होने वाले कार्यों में ऊपर से लेकर नीचे तक सबकी कमीशन बंधी हुई है। जितना ज्यादा विकास का ढिंढोरा पीटा जाता है, उतनी ही ज्यादा कमीशन महापौर से लेकर कमिश्नर तक सबको मिलती है। इसी भ्रष्ट व्यवस्था का नतीजा है कि नगर निगम के जरिए होने वाली खरीदी से लेकर प्रत्येक कार्य घटिया स्तर का होता है। हर विभाग अपने-अपने स्तर पर निगम को लूटने तत्पर है। दुर्ग नगर निगम क्योंकि विधायक अरूण वोरा की मंशानुरूप चल रहा है, इसलिए इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि भ्रष्टाचार को उनकी भी सहमति है।

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