
रायपुरएक घंटा पहलेलेखक: यशवंत गोहिल

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जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री तथा नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष व सांसद फारूक अब्दुल्ला 22 दिसंबर की शाम रायपुर आ रहे हैं, लेकिन वे जिसलिए आ रहे हैं, वह कहानी दोस्ती, मोहब्बत और वादे की मिसाल है। कहानी रायपुर के लेखक शिव ग्वालानी की है, जो सितंबर में कश्मीर गए थे। वहां उनकी दोस्ती 37 साल पहले एक युवा ड्राइवर से हुई, 1988 के दंगों के बाद नहीं मिला। ग्वालानी कश्मीर जाकर बड़ी मशक्कत से उसे खोजने में सफल हो गए।

चार दशक की दोस्ती की यह दास्तान कश्मीरी अखबारों में छाई रही। इसे पढ़कर फारूक ने शिव से मुलाकात की, कहानी सुनी और कहा कि – यही मोहब्बत कश्मीर है… साथ में वादा भी किया कि वे शिव की बेटी की शादी में रायपुर आएंगे। इसी वादे को निभाने फारूक 22 दिसंबर को रायपुर आएंगे और 23 को लौटेंगे। भास्कर से फारूक अब्दुल्ला के पर्सनल सेक्रेटरी मोहम्मद रफीक ने उनके आने तथा अगले दिन 9.30 को रवाना होने की पुष्टि कर दी है।
फारूक बोले- यही मोहब्बत तो कश्मीर है…
नगर के अखबारों में शिव और शफ़ी की दोस्ती की कहानी पढ़ी। जिसमें रायपुर से शिव 37 साल बाद शफ़ी को ढूंढने और उससे मिलने कश्मीर आता है। उसे मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ता है, फिर भी मुलाकात हो ही जाती है। और आख़िरकार वो शफ़ी से मिलता है। इतनी ख़ूबसूरत कहानियां कम होती हैं। कश्मीर इतना ही ख़ूबसूरत है, जितनी ये कहानी।
जब मुझे मेरे पीएसओ रफ़ीक ने बताया कि वो शख़्स जिनके बारे में कश्मीर के अख़बारों में खबरें आई हैं, वो अभी श्रीनगर में ही हैं। उन्हें घर बुलाया। शिव ने अपनी किताब उन्हें दी। उसने बताया कि इस किताब की एक कहानी इसी कश्मीरियत पर है। मैंने पढ़ी और उन्हें बधाई दी। मैंने कहा- ‘कश्मीर के इसी रंग को देश-दुनिया तक पहुंचाने की जरूरत है, इसी मोहब्बत को बढ़ाने की ज़रूरत है।’ शिव ने मुझसे कहा- ‘सर, अगर मैंने और मेरी कहानी ने ज़रा सा भी आपके दिल को छुआ है, तो यही मोहब्बत लौटाने आप रायपुर आइए। मेरी बेटी की प्री वेडिंग 23 दिसंबर को रायपुर में है।’ मैं इस प्यार को ठुकरा नहीं सका। मैं वही मोहब्बत लौटाने रायपुर आ रहा हूं।
कश्मीर में 1985 में शुरू हुई शिव-शफ़ी की दोस्ती
कश्मीर में 37 साल पहले यानी 1985 में वैसा तनाव नहीं था, जैसा हो गया। रायपुर के शिव पत्नी व कुछ दोस्तों के साथ कश्मीर घूमने गए। जम्मू पहुंचे, तो टैक्सी की। यहां टैक्सी ड्राइवर मिला शफ़ी मोहम्मद खान। वह सभी को लेकर श्रीनगर पहुंचा। करीब 10-12 दिन की बुकिंग थी। शफ़ी सभी को श्रीनगर और आसपास की वादियां दिखाता रहा। 8-9 दिन में ही वो सभी से घुलमिल गया था। सभी लोग उसे परिवार का सदस्य मानने लगे थे। उसकी ज़ुबान और लहजा कश्मीरी अंदाज़ में था, लेकिन वो जो भी कहता, उसकी बात दिल को छूती।
लिहाजा, शिव ग्वालानी ने शफ़ी से कहा कि तुम अपने परिवार को भी ले आओ एक दिन, मिलकर घूमते हैं। शफ़ी से बारे में इतनी जानकारी तब तक हो चुकी थी कि वो पेशे से ड्राईवर नहीं है। पुश्तैनी काम ज्वैलरी का है। कुछ नाराज़गी की वजह से वो ड्राईवर बनकर गुजारा कर रहा है। बहरहाल, अगले दिन शफ़ी का परिवार भी इन सबके साथ घूमने गया। सभी बहुत घुल-मिल गए।
अब अगले दिन शफ़ी ने शिव से कहा- आप सभी एक दिन मेरा मेहमान बनना कबूल कीजिए। मैं आप सबको दावत देना चाहता हूं। उसकी हालत ऐसी नहीं थी लेकिन उसके प्यार और जिद को देखते हुए सभी ने आखिरकार सभी ने हां भर दी। जब सब उसके गांव पहुंचे, तो देखा कि उसने पूरे गांव को दावत दे रखी है और ये बताया था कि कुछ ख़ास लोग मेहमान बनकर आ रहे हैं। पूरी रात मुशायरा, हंसी-ठहाके लगे। सभी ने बहुत प्यार दिया। अगले दिन सभी को वापस जम्मू वापस आना था। शफ़ी ही जम्मू छोड़ने वाला था।
जम्मू पहुंचने से पहले शिव ने शफ़ी से पूछा- “पिछले 10-12 दिनों तुमने बहुत अच्छा साथ दिया। अब कितना किराया हुआ, वो बता दो और अपने पैसे ले लो।” शफ़ी ने कहा- सोचा तो था लूंगा, पर आपने इतना ज्यादा दे दिया कि कुछ और पैसे लेने की हिम्मत नहीं रही। आप मेरे गांव मेरे मेहमान बनकर आए, मेरे अब्बू को अब्बू कहा, मेरी अम्मी को अम्मी कहा, मेरे परिवार के सदस्य बनकर रहे। इससे ज्यादा तो कुछ हो ही नहीं सकता। शिव ने कहा-“ऐसा कैसे हो सकता है, पैसे तो लेने पड़ेंगे।
” शफी ने अपने जूते उतारकर शिव की तरफ बढ़ा दिए और कहा- “एक काम कीजिए, ये दोनों जूते मुझे मारिए। मैं आपसे पैसे लूं, तो यही मुनासिब है।” ये देखकर सभी हैरान थे। बहरहाल, शफ़ी ने पैसे लिए ही नहीं और दोस्ती का रिश्ता कायम कर लिया। इसके बाद सभी रायपुर लौट गए। शिव और शफ़ी के बीच चिट्ठी, टेलीग्राम और तमाम माध्यमों के जरिए बातचीत होती रही। 1988 के बाद माहौल बिगड़ा। शफ़ी का परिवार भी उसमें शिकार हुआ। कोई खबर नहीं मिल रही थी। बाद के दौर में शिव भी अपने काम, परिवार में मसरूफ हो गए और सालों तक कुछ पतासाजी नहीं की।
शिव को कश्मीर में इंटेलिजेंस ने उठा लिया, फिर भी ढूंढकर ही रहे
2016 में शिव ग्वालानी का एक्सीडेंट हुआ। अस्पताल में भर्ती थे, तो उन्होंने अपने संस्मरणों को किताब की शक्ल में उतारना चाहा। उनकी किताब आई मास्टर ऑफ नथिंग्स..। इस किताब में उसी शफ़ी की कहानी भी है। सितंबर 2022 में कुछ लोग कश्मीर जा रहे थे, तो उन्होंने शिव से भी चलने कहा। कश्मीर सुनते ही वे तैयार हो गए और सोचा कि शफ़ी को खोजूंगा। शिव उन्हीं जगहों पर जाते, जहां 1985 में शफ़ी ले जाया करता। लोगों से शफ़ी के बारे में पूछताछ करते।

शफ़ी मोहम्मद
इंटेलिजेंस को शक हुआ तो शिव को पकड़ लिया और गहरी पूछताछ हुई। फिर सच्चाई जानकर उन्हें छोड़ दिया गया। चूंकि शिव ज्वैलरी कारोबार से जुड़े हैं, इसलिए वहां के सराफा एसोसिएशन गए और पूरी बात बताई। उनके पास किताब मास्टर ऑफ नथिंग्स थी, जिसमें कश्मीर की इस कहानी का जिक्र था। एसोसिएशन हैरान था, और खुश भी। उन्होंने मदद की और दो तीन घंटे में ही शफ़ी का पता चल गया।
उन्होंने फोन पर शिव की शफ़ी से बात कराई। शफ़ी थोड़ा डरा हुआ था कि कौन मिलने आया है। वो बात नहीं कर रहा था। जब उसे यकीन हो गया, कि ये वही शिव ग्वालानी है, तो फौरन अपनी बुलेट लेकर उससे मिलने आया। शिव की किताब और इस दोस्ती की चर्चा वहां के कुछ पत्रकारों के पास पहुंची, तो वहां ये खबर सुर्खियों में रही।
