
बालोदएक घंटा पहले

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बालोद जिले में मां बहादुर कलारिन का नाम एक देवी की तरह लिया जाता है। वे पूरे छत्तीसगढ़ के साथ-साथ कलार समाज के पौराणिक इतिहास का हिस्सा हैं। मां बहादुर कलारिन के प्रचलित किस्से लोक-कथाओं में सुनने को मिलते हैं। बालोद जिले से 26 किलोमीटर दूर चिरचारी और सोरर गांव की सरहद पर उनका स्मारक और मंदिर स्थित है, जो उपेक्षा का शिकार है।

मां बहादुर कलारिन के नाम से राज्य अलंकरण की घोषणा भी प्रदेश सरकार द्वारा की गई है, लेकिन जहां पर उनका स्मारक और मंदिर है, वो कहीं न कहीं उपेक्षित है। यहां लगने वाला मेला भी कुछ वर्षों से बंद है। आसपास के लोगों ने बताया कि माची (पत्थरों का ढांचा) की देखरेख के लिए एक कर्मचारी की नियुक्ति की गई है, जो कभी-कभी यहां आता है। कुछ असामाजिक तत्वों ने इसके पत्थरों को भी गिरा दिया था। उन्होंने कहा कि जब हम इसके पास जाते हैं, तो लगता है कि यह अपने भीतर सैकड़ों राज समेटे हुए हैं।

उपेक्षा का शिकार स्मारक।
कहते हैं नीचे दबा है सोना
आसपास के लोगों का कहना है कि वे सालों से सुनते आ रहे हैं कि जिस जगह माची बनी हुई है, उसके नीचे करोड़ों रुपए का सोना दबा हुआ है। हालांकि इस बात में कितनी सच्चाई है, ये तो खुदाई के बाद ही पता चल सकेगा। लोगों का कहना है कि सरकार को इस पर शोध करना चाहिए। पुरातत्ववेत्ताओं को शोध करना चाहिए, तब मां बहादुर कलारिन की वास्तविकता और कई सारे राज सामने आएंगे।
नारी उत्थान के लिए करती थीं काम
मां बहादुर कलारिन नारी उत्थान के लिए काम करने वाली महिला थीं। उन्होंने नारियों के सम्मान के लिए अपने बेटे को भी नहीं छोड़ा और उसे मौत के घाट उतार दिया। हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि उनका बेटा मातृ प्रेम की एक मिसाल था। उसने अपनी मां के सम्मान के लिए बहुत कुछ किया।

मां कलारिन की माची।
मां कलारिन के जीवन की कहानी
ये उस समय की बात है, जब छत्तीसगढ़ में कलचुरी शासन खत्म हो रहा था। कई गांवों के लोग जगह बदलने को मजबूर थे। उन्हीं में से एक थे गौटिया सुबेलाल कलार, जिनकी शराब की दुकान थी। हालांकि राजाओ के शेष काल अब भी बचे हुए थे। सुबेलाल गौटिया की बनाई शराब दूर-दूर से लोग पीने आते थे। उनके छोटे भाई की बेटी कलावती ही उनके पास परिवार के नाम पर थीं। कलावती के पास भी चाचा सुबेलाल को छोड़कर परिवार में कोई नहीं था।
सुबेलाल के साथ मदिरा दुकान में कलावती सहयोग करते हुए बड़ी हुई। वे काफी बहादुर थीं और उन्हें बुरे लोगों को सबक सिखाना भी अच्छी तरह से आता था। चाचा सुबेलाल ने कलावती को खेल-खिलौनों से दूर रखते हुए लाठी, कटार और तलवार चलाना सिखाया था। वे भतीजी को इन कलाओं में पारंगत बनाना चाहता था। चाचा की मौत के बाद मदिरा की दुकान चलाती कलावती को बहुत सारे राजाओं के प्रेम प्रस्ताव आए। बाद में उन्होंने एक राजा से शादी की। उन्हें एक बेटा हुआ, लेकिन पति ने पत्नी से धोखा किया और उसे छोड़ दिया।
अब कलावती अपने बेटे के साथ अकेले दिन गुजारने लगी। लेकिन बेटे के मन में पिता का दिया धोखा समाया हुआ था। इसलिए वो राजा की बेटियों को धोखा देने लगा। वो उनसे शादी करता और छोड़ देता। जब कलावती को जब इस बात का पता चला, उन्होंने अपने बेटे को मारने की योजना बनाई। उसने अपने बेटे को पानी तक देने से मना कर दिया। धीरे-धीरे बेटे की हालत खराब होने लगी। अधमरी हालत में जब वो कुएं के पास पहुंचा, तो मां कलावती ने बेटे को कुएं में धक्का देकर खुद भी कूद गई। दोनों की मौत हो गई। आज कलावती को बहादुर कलारिन के नाम से जानते हैं।
